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लघु पुस्तकों का संग्रहालय

9R8M+G2M Bakü, Azerbaycan

  • बाकू का मिनिएचर बुक म्यूजियम (Miniature Book Museum)

    यह संग्रहालय अज़रबैजान के बाकू के ओल्ड सिटी (इचेरीशेहर) में स्थित है। इसका आधिकारिक उद्घाटन 23 अप्रैल, 2002 को हुआ था। इसकी स्थापना ज़रीफ़ा सलाखोवा (Zarifa Salakhova) द्वारा की गई थी, जो इसकी मुख्य संग्रहकर्ता भी हैं। यह संग्रहालय दुनिया भर के विभिन्न देशों से एकत्र की गई मिनिएचर किताबों — यानी बेहद छोटे आकार की किताबों — को प्रदर्शित करता है।

    विशेषताएँ और संग्रह (Features and Collection)

    • यह संग्रहालय दुनिया में अपनी तरह का एकमात्र ऐसा संग्रहालय माना जाता है जो पूरी तरह से मिनिएचर किताबों को समर्पित है।

    • ये किताबें अविश्वसनीय रूप से छोटी हैं; कुछ तो 2×2 मिमी जितनी छोटी हैं।

    • संग्रह की सबसे पुरानी किताब 17वीं सदी का एक मिनिएचर कुरान है।

    • 2014 में, संग्रहालय के संग्रह को गिनीज वर्ल्ड रिकॉर्ड्स द्वारा दुनिया के सबसे बड़े मिनिएचर बुक संग्रह के रूप में मान्यता दी गई थी।

    • ये किताबें अज़रबैजानी, रूसी, अंग्रेजी, जर्मन, अरबी और अन्य सहित कई अलग-अलग भाषाओं में प्रकाशित हैं।

    • प्रदर्शनी को अज़रबैजानी लेखकों, बच्चों की किताबों और दुनिया भर की मिनिएचर किताबों जैसे विषयों के तहत वर्गीकृत किया गया है।

    यात्रा संबंधी जानकारी (Visiting Information)

    • पता: 67, 1st Qala Street, इचेरीशेहर, बाकू।

    • खुलने का समय: खुलने का समय बदल सकता है, इसलिए जाने से पहले आधिकारिक वेबसाइट की जाँच करना या कॉल करना उचित है।

    • प्रवेश: प्रवेश अक्सर निःशुल्क होता है, और आगंतुकों के लिए गाइडेड टूर भी उपलब्ध हैं।

    यह क्यों दिलचस्प है? (Why It’s Interesting)

    • मिनिएचर किताबें बेहद छोटे पैमाने पर छपाई, डिजाइन और बाइंडिंग में असाधारण शिल्प कौशल का प्रदर्शन करती हैं।

    • संग्रह ऐतिहासिक और अंतरराष्ट्रीय दोनों है, जो विभिन्न देशों और समय अवधियों का प्रतिनिधित्व करता है।

    • पुस्तक प्रेमियों के लिए, यह देखने का एक दुर्लभ अवसर है कि प्रकाशन की कला में सबसे छोटे प्रारूप में भी कैसे महारत हासिल की जा सकती है।

    संक्षिप्त इतिहास (Brief History)

    • ज़रीफ़ा सलाखोवा ने 1980 के दशक में मिनिएचर किताबों का संग्रह करना शुरू किया।

    • संग्रहालय को 2000 में आधिकारिक पंजीकरण प्राप्त हुआ।

    • गिनीज बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड्स में सूचीबद्ध होने के बाद 2014 में इसे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान मिली।

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